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व्यक्ति के अस्तित्व का मूल बिंदु हैं पिता
पहले की हिन्दी फिल्मों में हर रिश्ते को गीतों में तरजीह दी जाती थी। सिर्फ प्रेम-गीत ही नहीं बनते थे। भाई-बहन के रिश्तों पर गीत बनाए गए, ‘सुन भई चाचा, हां भतीजा’ जैसे गीत भी बने। दोस्ती पर तो कई गीत हैं, इसी तरह मां पर गीतों की भरमार भी मां से जुड़ी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। और हां, पिता या पिता द्वारा भी हिन्दी फिल्मों में कई गीत हैं जो पिता के वात्सल्य की दिल को छूने वाली अभिव्यक्ति करते हैं।
‘बाबुल की दुआएं लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले’, सुनकर अच्छे-अच्छे पत्थर दिल पिघलते देखे गए हैं। पिता किसी भी व्यक्ति के अस्तित्व का मूल बिंदु है।
अभी-अभी एक ऐसी महिला की कहानी पढ़ी, जिसने आईवीएफ के जरिए सिंगल मदर बनना पसंद किया। महिला को आईवीएफ चिकित्सकों ने भी काफी समझाया-बुझाया लेकिन वो मानी नहीं। अब वह एक बच्ची की मां हैं। यह महिला सक्षम हैं, निश्चित ही वह बच्ची की परवरिश बहुत अच्छे से कर पाएंगी।
मगर यह सोचकर थोड़ा आश्चर्य होता है कि बच्ची बड़ी होकर कभी अपने पिता के बारे में सोचना चाहेगी तो पिता के स्थान पर क्या हासिल होगा? शून्य?
आईवीएफ जैसी तकनीक नि:संतान दंपति के लिए वरदान बनकर आई है, मगर उस केस में बच्चे को मां और पिता दोनों ही मिलते हैं। किसी के पिता की अल्पकाल में ही मृत्यु हो जाती है तो उसके पास भी वो तस्वीरें और वो किस्से सुनाने वाले होते हैं जो पितृहीन व्यक्ति की कल्पना में ही सही, पिता को साकार करते हैं। जिन अभागे बच्चों को त्याग कर लोग चले जाते हैं या मां-बाप दोनों ही काल-कवलित हो जाते हैं वे बच्चे भी भाग्य की मार समझकर अपने जीवन को स्वीकार कर लेते हैं।
लेकिन स्वयं फैसला लेकर सिंगल मदर बनने वाली महिला की बच्ची के लिए कभी न कभी भावनात्मक मुश्किलें आ सकती हैं। क्योंकि उसके तो पिता है ही नहीं, कहीं नहीं, न थे। खैर, अपना-अपना फैसला है। मगर इतना तय है कि मां की तरह ही पिता का वात्सल्य भी अनमोल है। बस यह कि उसे पहचानने के लिए विशेष दृष्टि लगती है। पिता का प्यार बरसते हुए नहीं दिखता, उसे महसूस किया जाता है, उनके अदृश्य प्रेम और संरक्षण में। पिता की जगह शून्य हो तो मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक मुश्किलें आ सकती हैं।